मैं और मेरा मन








सच में यह आसमान कितना सच्चा है, क्योंकि

इसके पास छिपाने के लिए,

कुछ है ही नहीं..

इसे जब भी देखो पूरा देखने का मन करता है,

एक चादर सा, पूरा आंखों में..

समेट लेने का दिल करता है,

काफी देर तक घूरते रहने के बाद,

कुछ ना दिखने का सुकून भी

बयां नहीं किया जा सकता..

ये कुछ ऐसा होता है,

जहाँ एक बड़ा सा मैदान हो..

जहां सबसे लंबी दौड़ लगाई जा सके,  

दौड़ते - दौड़ते थकान से शरीर चूर हो जाए,

पर मैदान की विशालता उसे पूरा दौड़ने का

ज़ोश चढ़ा देती है..., सच में,

इस विशालता को सिर्फ

महसूस किया जा सकता है,

जैसे मेरा मन..

उसमें समा जाने का एहसास,

जहां खुद को फिर से खोज पाने की आशा

बहुत छोटी सी लगती है,

पर कभी-कभी यह बहुत अपना सा,

या अपने जैसा लगता है,

मैंने कई दफा देखा है,

यह कुछ हद तक मेरे जैसा ही है..

शायद मेरे मन जैसा,

जो हर जगह हर, हर वक्त अलग - अलग रहता है,

या यूं कहें बहता रहता है,

यह हर पल बदलता है..

बिल्कुल मेरे ख्यालों की तरह,

कभी यहां तो कभी न जाने कहां..

परत - दर - परत, और गहरा होता जाता है,

बाहर से काफी सुलझा हुआ.. और शांत दिखता है,

पर हलचल तो वहां भी है,

वहां हवाओं की.. और मुझ में,

मेरे मन में, भावनाओं की..

ऊपर से सब कुछ देखता है,

चुपचाप.. बिल्कुल मेरे मन जैसा..

पर कुछ कहता नहीं, बिल्कुल मेरे मन जैसा..

जब वह अपनी पर आता है,

आग बरसाता है,

और मेरा मन खुद को जलाता है..

भारीपन से दुःखी होने पर,

हम दोनों एक जैसे हैं वह बरसता है..

और मेरा मन रोता है..

थकान उसे भी होती है,

थकान में वह अँधेरे में छुप जाता हैं,

और मेरा मन अकेलेपन में..,

खुश ना होने के इशारे भी देता है,

वह बिजली चमकाता है..

और मेरा मन नज़रे चुराता है,

ये सारी हरकतें, हम ख़ुद में रहकर 

अलग - अलग करते हैं,

ये टकराव हर पल, हर रोज़ होते है 

हम एक क्यों नहीं,

खुद में हो कर भी.. खुद में ही नहीं,

इतनी दूरी क्यों...? पता नहीं,

मैं और मेरा मन...


 

- अमित कोरी



 


1 comment:

Powered by Blogger.