क्या चलना जरूरी है..?
क्या चलना जरूरी है..?
दौड़कर थक जाने में, जो
जिंदगी है.. वह चलकर
सिमट जाने में कहां..!
कभी-कभी सोचता हूं,
कि इतना तेज दौड़ू कि,
सारी थकान, सारे जंजाल,
पीछे छोड़ पसीने की तरह बहा दूं..
फिर सुकून की ठंडी हवा,
मुझे चारों तरफ से घेर ले..,
और मैं बादलों सा हल्का,
एक तिनके की तरह उड़ जाऊं
वह एक एहसास जिंदगी को इतना,
आसान और हल्का दिखाता है..,
कि सारे शिकन और भाव,
सूखे पत्ते से झड़ जाते हैं..
किसी से जुड़े ना रहने का सुकून,
और बाद में खुद को अकेला..
पाने का डर दोनों एक साथ
महसूस करना एक अलग अनुभव है..
शायद इसीलिए, मुझे दौड़ना पसंद है,
चलने के.., मैं एक बार को बहुत ज्यादा
थककर, बहुत ज्यादा सुक़ून पाना चाहता हूं..
ये लालच मुझें, और ज्यादा..
दौड़ने और थकने पर मजबूर
कर देता है, और मैं उस एक अनुभव,
की तलाश में और ज़्यादा थकता जाता हूं..
चलना एक तरीके से मुझें, बूढ़ा कर देता है,
वो थकान के बाद वाला सुकून मिल ही नहीं,
पाता और रास्ता बढ़ता जाता है..!
इसलिए, क्या चलना जरूरी है..?
- अमित कोरी
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