सब कुछ कोमल - कोमल हो गया.. - अमित कोरी









सारा कालापन बह गया,
आसमान निहार रहा था यूंही..
निहारता ही रह गया
सब कुछ कोमल - कोमल हो गया..



कुछ बदला है, कुछ वैसा ही रह गया
पर बदलाव जरूरी है, यह तूफान कह गया 
अब जीना तुम्हें है, तुम ही देखो
बहुत घीस ली साबुन की जिंदगी,
अब असल में जीना सीखो..



रहना तो हमें यही, जमी पर है,
तो क्यों ना कुछ चीजें सही कर ले,
क्या हर बार यूंही, छुपते फिरेंगे दर - बदर..
एक बार जो धरती चाहती है,
क्यों ना वही कर ले..


लेकिन, शायद छिपना तो हमें तब भी पड़ेगा, 
करोड़ों सालों से यूंही मुफ्त में रह रहे हैं, 
यही का खा रहे हैं, यही खा पी रहे हैं
उसका किराया भी तो भरना पड़ेगा..



जो भी हो, कर्ज़ तो हम चुका देंगे,
आखिर इंसान हैं, वह भी एक नहीं तमाम है.. 
तुम्हें चुप करा देंगे, कोशिश करेंगे दो - चार पौधे लगाने की, 
बाद में बचे हुए जंगलों को भी चुपचाप साफ करा देंगे..



यह अंत है, या अंत की शुरुआत..
शायद उसी को पता हो, जो सड़क किनारे पेड़ों में दबा हो..
वह आसमान की तरफ मुंह करके कुछ ढूंढते - ढूंढते खो गया,
वह चीज ना मिलने पर उसी आसमान में कफन डाल कर सो गया
सब कुछ कोमल - कोमल हो गया..




- अमित कोरी

for more such content do follow me on Instagram here - https://www.instagram.com/amitkori_/ 





Also read :


No comments

Powered by Blogger.