ऐ मर्द , डरता है तू ... - अमित कोरी
कमज़ोरी छुपाते ये अल्फ़ाज़ तेरे
डरे - डरे से लगते हैं,
इसलिए ख़ुद को मर्दांनगी (मर्द) के चोले में
छुपाने की कोशिश करता है, तू
ऐ मर्द , डरता है तू ...
क्यों डराता है उनको जो तेरे क़ाबू में है ,
सताता है उनको जो तेरी पनाहों में है,
ख़ुद को झूठी ख़ुशी देने के लिए
दूसरों को रुलाता है,
ऊँची हर उस आवाज़ से छिपता है , तू
ऐ मर्द , डरता है तू ...
तू क़ाबिल नहीं उस चीज़ के, जिसे तू पाना चाहता है,
तुझमें में कोई लगन नहीं उसे कमाने की
तू बस उससे चिढ़ता है,
तू बस उसे हराना चाहता है,
भले ही तू छिपा ले जितना भी, बसता तुझमें भी एक हैवान है
ऊपर - ऊपर से तू हँसता है, लेक़िन तेरी आँखों में एक तीर सा दिखता है,
जो हर पल तलाश में है, किसी कमज़ोर के
जो तेरी आँखों को चुभता है,
मन का बड़ा ही मैला और मोहब्बत की बात करता है, तू
ऐ मर्द , डरता है तू ...
अपनों में ही रहकर, दूसरों को तकता है,
बात चाहें बने न बने, मेहफ़िल चाहे सजे न सजे
ख़ुद के भलाई की उम्मीद तू चारो तरफ़ से रखता है...
कोई बड़ा मसला भी नहीं ,की बात पुरानी हो
तू वाकए- ए-आम में भी चिढ़ता है,
जहा भी थोड़ी ढील दिखें,
या सामाजिक धारणाओं को कसती कोई कील दिखें,
या सामाजिक धारणाओं को कसती कोई कील दिखें,
हर मसलें में रूढ़ता है, तू
ऐ मर्द , डरता है तू ...
कब तक यूँ ही तड़पाएगा अपनी और औरों की आवाज़ों को
बोल ज़ोर से डरता हूँ, ख़ुद में हो कर भी ख़ुद से छिपता हूँ
कहीं कोई डरा न दे इसलिए भी वैसा (ऐसा करता हूँ) हूँ
कोई वो बात बता न दे इसलिए भी डरता हूँ
बाहर से देखकर भी अंदर से अनदेखा हूँ
मुझे पता हैं, तू अपने कारनामों के क़िस्से
दुनिया को सुनाएगा
वाह - वाहियों के ढ़ेर में अपनी बुज़दिली छिपायेगा
पर क्या सच में तू इससे ख़ुश रह पायेगा
आज ही नहीं, ज़माने से तेरा ओहदा ऊँचाइयों
पर बस्ता है,
जो कोई कोशिश भी करें वहाँ पहुँचने की,
तू काले साँप की तरह उनको डस्ता है।
क्या यहीं समानता है, वो जिसकी बातें
हम हर सामाजिक समारोह में करते हैं,
या केवल ख़ुद को सही दिखाने की चाह में
दूसरों पर तंज़ कसते है...
सियासतें केवल योजनाओं का मुँह दिखाकर
अपना पल्ला झाड़ लेती हैं
जो कुछ करने की बारी आए तो दो - चार स्कूटर
बँटवाकर, लोगों का झूठा सम्मान लेती है
कहने को तो इंसानों के बीच रहता है, तू
पर मौक़ा मिलने पर जानवरों से भी ज़्यादा घिनौंना
बन जाता है , तू
कुछ समझने की क्षमता नहीं तुझमें,
बस अपनी बात मनवाना चाहता है, तू
ऐ मर्द , डरता है तू ...
- अमित कोरी
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