इस बार हमारी बारी हैं - अमित कोरी


                                                                  





हम सत्य जानते हैं , और
झूठ का विरोध भी करते है ,
सहम जाते है , कभी - कभी 
पर चुप रहने से डरते है 



कुछ आते हैं , धमकाने के लिए 
तो , कुछ जान लेने की हिमाक़त (वक़ालत) करते है ,
और, हम अगर सड़कों पर आ जाए 
तो , हमें देशद्रोही की ज़बान कहते है 



ख़ामोशी में (से) आग लगाकर, 
उँजियारे में धुँआ उठाते हैं
और , जो पढ़ लें इनके मंसूबों को, 
ये अनपढ़ उसे बताते है



जान हलक़ में आ जाती है, चिल्ला - चिल्लाकर
फ़िर भी ये नहीं सुन पाते है, 
जब बदलाव की धुन गूँजे हर ओर ,
तब , ये बेहरे बन जाते है



पता है ..., इस बार चिल्लायेंगे नहीं, दहाड़ेंगे
कुछ ऐसा , की तुम्हारा प्रशासन तक हिला डालेंगे ,
आवाज़ या तलवार से नहीं ,
सिर्फ़ धारदार शब्दों से लताडेंगे 



सुधर (संभल) जाओ हम कहते है ,
वरना, तुमको दिखलायेंगे 
किसे कहते है , लोकतंत्र ,
ये फ़िर से तुम्हें सिखलायेंगे ...



हम लोकतंत्र है , आज का 
जिस पर हमको अभिमान है ,
ऊँच - नींच का भेदभाव जहा न 
मक़सद जिसका सम्मान है ,



वो भूल गए इस बात को 
कुछ , नाज़ुक़ से हालत को, की 
सँघर्ष अभी भी ज़ारी है 
इस बार हमारी बारी हैं 


" हम आज़ाद हैं "




- अमित कोरी 


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2 comments:

  1. Wonderful poem dude.... Hats off to young minds of India

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    1. Thanks brother, i really appreciate it. please take part and share it to reach more peoples.

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