सब चंगा सी..!! - अमित कोरी







ख़ुद की जेब में फूटीं कौड़ी नहीं, 
लेकिन सपनें "पॉंच ट्रिलियन डॉलर" के दिखाएंगे 
अपनों का पेट तो ठीक से भर नहीं सकते,  
दूसरों को कहाँ (ख़ाक) से खिलाएंगे ?




स्कीमें  रहीं है, जा रहीं है 
सरकार सपनें दिखा रही है, 
कोई हमें यह भी बताएगा की, 
रिसेशन में "कांदा" कौन खायेगा ?




रही बात मौसम की तो, कुछ "पेड़" कटे है, 
बाक़ी सब कुछ ठीक - ठाक चल रहा है 
हाँ थोड़ी हताहत भी हुई है, 
पर "मेरा देश बदल रहा" है 




पर वो देश चलातें है, 
कुछ तो समझ रखतें होंगे ?
अपना वोट बैंक बढ़ाएंगे 
और, "भाईयों और बहनों" को सरे आम पिटवायेंगे 




बाक़ी  तो ज़माने का रोना है, 
हमेशा रोते रहतें है  
"दो - चार" रुपये मेहंगाई क्या बढ़ा दी 
अब, सब सड़कों पर आकर सोते है




जो भी बोलो...  
हम अब भी सो रहे हैं, 
समाजिक मुद्दों को छोड़ अपनों पर रो रहें है 
"बकरें की अम्माँ" कब तक ख़ैर मनाएगी, 
एक दिन ये बात तुम पर भी आएगी...




कहो  कहो...
अब धंधा मंदा सी, 
देश का संविधान हो गया नंगा सी 
पर, "सब चंगा सी...!!!" 




अमित कोरी


( I really don't know how you take it. but their was few things, which needs to be pointed on and put on the table. so i have just summarized that part as a poem. if anyone's sentiments OR so called bhaktism is hurt by me or my poem than it is sorry from side. - amit kori )


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