मैं कौन हूँ - अमित कोरी
मैं चोर हूँ,
उन लम्हों का जिन्हें तुमने बड़ी
मशक्क़त से सजाया है
चुरा लूँगा सब एक बार में,
मैं वक़्त हूँ, गुज़र जाऊँगा हाथ न आऊँगा
मैं बल हूँ,
उन बाज़ुओं का जिनमें कभी शिथिलता थी,
हार जाने की, सेहम जाने की,
आज वो तैयार हैं, ज़माने से
दो - चार करने के लिए
मैं शाम हूँ,
उन यादों की जिन्हें तुमने अपनी बाँतों से,
कब का बेदख़ल कर दिया है
फ़िर लौटूँगा उस मक़ाम पर जब तुम याद करोगे,
यादों में भी और बाँतों में भी
मैं परिंदा हूँ,
उस आसमान का जहा आज़ादी है
वक़्त से रूबरू होने की,
आशाओं का पहाड़ है, पर कोई डर नहीं गिर जाने का,
क्यूँकि संभालना भी वहाँ की आज़ादी का हिस्सा है
मैं ख़ामोशी हूँ,
उन अल्फ़ाज़ों की, जिन्हें न कहने पर भी
सब कुछ सुन लिया हो ऐसा लगता है
कह कर देखों कभी उन शब्दों को,
गूंगे से लगते है
मैं सब्र हूँ,
उस सुरज का जो चाहें तो जला कर
ख़ाक कर सकता है, पर वह जलता हैं अपनी गति से
कभी - कभी चिढ़ भी जाता है, पर शाम भी है,
जो उसे डूबा ले जाती है
मैं रौशनी/दिशा हूँ,
उस रास्ते की जो आगे चलकर तुम पर ख़त्म होती है
चाहे भटक जाऊँ कितने भी रास्तें,
तुम तक पहुँच ही जाऊँगा, क्यूँकि
ये जो प्रेम हैं ये चौंतरफा है
असल में...
मैं कुछ नहीं,
मै आइना हूँ, जो देखता हूँ बन जाता हूँ
मैं झूठ भी नहीं, सच का एक तरीक़ा हूँ
आज़माओ तो सही, मैं हर एक का हूँ
- अमित कोरी
i'll be uploading second part of this poetry, till then stay tuned.
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