स्वराज - अमित कोरी




(This poetry is dedicated to my friend "Swaraj"
who is a social worker and doing a great job for child cancer patients)


है थोड़ा सा लापरवाह, पर लाज़वाब है वो,
अँधेरे को जो रोशन कर दे 
ऐसा आफ़ताब है वो,
युहीं नहीं, स्वराज है वो...




अपनी बाँतों को जो दरकिनार करें,
दूसरों के लिए जो मशाल सी जले 
चिंगारी नहीं ज्वालामुखी का भंडार है वो,
युहीं नहीं, स्वराज है वो... 




ज़िद तो है, पर थोड़ी चाहत भी उसमें, 
न मिलने पर संभाल सके
ऐसी राहत भी है उसमें,
गिर के उठने की आगाज़ है वो 
युहीं नहीं, स्वराज है वो... 




वादो - विवादों को भूल जाता है,
पर मानवता का धर्म बड़ी शिद्दत
से निभाता है,
कौन इसको ये पाठ भी पढ़ायेगा की,
ज़माना अपनी देख आगे निकल जायेगा 



दुनियाँ की बहुत कर ली 
कुछ अपने लिए भी तो सोच, 
जिंदगी युहीं निकल जाएगी 
कुछ पल तो ख़ुद के लिए रोक,



तकलीफ़,
अपनी छोड़ औरो की उसे दिखती है 
परेशानियाँ कभी - कबार चेहरे पर टिकती है,
लाँखो की जिंदगी का सरताज है वो 
युहीं नहीं, स्वराज है वो... 



अगर,
आज कुछ सीखना है स्वराज से 
तो सिखों,
की ज़माना झुकता है सच की आवाज़ से 
न की गाली, धमकी और
बेमतलब की बकवास से...



- अमित कोरी




1 comment:

  1. U just fuckup bro kill poem thanks alot yaar you r doing a wonderful job..

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