कुछ लोग कहते है.. - अमित कोरी





...न कर पाओगे, फिर गिर जाओगे
शर्म  नहीं आती, कैसे रह (सह) पाओगे
ढंग से चल तो सकते नहीं,...
दौड़ कर दिखाओगे,...

दिन - रात यही सब सहते है 
कुछ लोग कहते है.. 

बेवकूफ़ मत बनो करियर का सवाल है 
फला - फला बैंक से दस लाख का उधार है 
मार्क्स तो देखो, शर्म से मर जाओगे 
दस लाख का उधार है, कैसे चुका पाओगे 

बोझ तले यूहीं दबे - दबे से रहते है
कुछ लोग कहते है..

बरबाद हो गया, दोस्ती में ये नासाज़ हो गया 
शर्मा जी को देखा है, नेवी में उनका बेटा है 
घर - गाड़ी और समय का लेखा - जोखा है 
दिन भर काम और रात को चैन से सोता है 

इन्हीं शब्दों में हम अक़्सर दिखते है 
कुछ लोग कहते है..

तुमने ही इसे सर पर चढ़ाया है 
दो रोटी कमाना छोड़ एरोप्लेन पर बिठाया है 
कब तक हम इसे यूँही इसे मुफ़्त का खिलाएँगे 
लोग ताने मार - मारकर हमें सुनाएँगे 

सपनों में भी, अब तो लोगों की ही सुनते है 
कुछ लोग कहते है..

भटक जायेगा तू एक दिन ग़ुमनामी में 
इन्हीं ऊँची मीनारों की सुनामी में 
कब तक लोगों की बाँतों का बोझ उठायेगा 
बात मान थक जायेगा 

कभी - कभी सुकून की सांस भी भरते है 
कुछ लोग कहते है..

एक दिन ऐसा आयेगा
ज़माना बहुत आगे निकल जायेगा 
तू रोयेगा.. पछतायेगा.. 
वक़्त की बेड़ियों में जकड़ा रह जायेगा 

बेवज़ह वक़्त की भी मार सहते है 
कुछ लोग कहते है..

पर तू डर मत, सब का टाइम आता है 
देर - सवेर सबको समझ में आता है 
जब तक तुझे यह समझ में आयेगा 
ये ज़माना तुझे नोंचकर खा जायेगा.. 

हर पल टुकड़ो - टुकड़ो में बंटते है 
कुछ लोग कहते है..

हमसे से भी पूँछो हम क्या कहते है 
कोने में खड़े - खड़े हर बात को सहते है 
जो न कभी दिखते थे, अब वो भी हँसते है 
अपनी बात छोड़ मेरी पर आ टिकते है 

दिल की बातों को कहने से डरते है 
कुछ लोग कहते है.. 


- अमित कोरी



i'll be uploading second part of this poetry, till then stay tuned.


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