ज़िद - अमित कोरी
चल कर नहीं उन्हें दौड़ कर दिखाऊँगा
मानूँगा नहीं हर बात मानवाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
काम करूँगा बहाने न बनाऊँगा
सूरज से पहले मैं उठ जाऊँगा
अपनी कहानी मै ख़ुद लिख जाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
सुनकर ये गालियाँ मै चुप रह जाऊँगा
किसी की भी बात को न दोहराऊँगा
रात की बात को, सुबह की डाँट को,
बीच में न लाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
जीत से, हार से, उनकी फँटकार से,
तेरी दरक़ार से, बीती हुई बात से,
काटी हुई रात से, ऊपर उठ जाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
इतनी बात को उतना न बनाऊँगा
किसी याद में न रुक जाऊँगा
अपनी सोंच का दायरा न बनाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
वक़्त को वक़्त का मतलब समझाऊँगा
डर की दीवार से कूद कर दिखाऊँगा
औरो को नहीं मै ख़ुद को सिखाऊँगा
यूँ ही नही कुछ कर के दिखाऊँगा
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Good try
ReplyDeleteThis one was my best poem keep writting bro..!!
ReplyDeleteGood one
ReplyDeleteNice one and very motivational
ReplyDeleteThank u so much for inspiring us :)
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