अभी बाक़ी है - अमित कोरी
....हर दिन की यही कहानी है आज कह दूँगा बस इसी की आस में डेढ़ महीने हो गए है, कह तो अब भी नहीं पाया हूँ लेकिन इस बीच कहनी वाली बाँतों को लिख ज़रूर लाया हूँ, पढ़ भी पाउँगा या नहीं वो तो नहीं पता पर लिख कर लगा की सब कुछ कह दिया हो
अब बस यह पढ़कर उसे यह एहसास सा हो जाए
की आज की शाम थोड़ी आबाद सी हो जाए
उन्हीं बातों के बीच से कुछ बातें यहाँ उठा लाया हूँ .....
पढ़ना ज़रा ग़ौर से
पढ़ना ज़रा ग़ौर से
कुछ बातें तुम तक आकर रुक जाती है
कहनी होती है, पर चुप सी हो जाती है
बेवज़ह मशगूल, बेपरवाह सी हो जाती है
क्योंकि बात पूरी नही अभी बाक़ी है
शामें अलहदा रंगीन सी हो जाती है
रात की चमक आँखों की याद दिलाती है
सुबह की अंगड़ाई मौसम का हाल जताती है
क्योंकि बात पूरी नही अभी बाक़ी है
मन में कविताओं की भरमार सी हो जाती है
कागज़ कलम की मोहताज़ सी हो जाती है
शब्दों की लड़खड़ाहट ज़ुबाँ पर आ जाती है
क्योंकि बात पूरी नही अभी बाक़ी है
अजीब सा मज़ा है, कह कर चुप रह जानें में
बात पूरी करने की ज़रूरत चेहरे से दिखाने में
इन्हीं बातों की वो मुरीद सी हो जाती है
क्योंकि बात पूरी नही अभी बाक़ी है....
- amit kori
- amit kori

Leave a Comment