आँखें - अमित कोरी

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दुनियाँ में अलग-अलग शख़्शियते है कुछ का व्यक्तित्वा उनके काम से झलकता है और कुछ का उनके नाम से लेकिन कई बार ख़ुद को छिपाने के चक्कर में लोग यह भूल जाते है की आँखों से कुछ नहीं छिपता उन्ही कुछ आँखों के बीच मैं भी रहता हू मुझे उन आँखों में उनका मतलब साफ़ झलकता है सब अपनी-अपनी आँखों में अपनी सच्चाई लिए घूम रहे है उन्ही कुछ आँखों का ज़िक्र मैंने इस कविता में किया है 

आँखों पर बदली छा जाए 
आँखें ही बरसाती है 
पत्थर दिल जो इनमें झाँके 
उनको भी पिघलाती है 

आँखें ही करती है बाँतें 
आँखें ही करवाती है 
कह न पाये बात जुबां जो 
आँखें यूँ कह जाती है 

आँखों का यह खेल अज़ब है 
आँखों का यह मेल गज़ब है 
ख़ुशियों को बरसाती है 
वरना बहुत रुलाती है 

सच का यही पिटारा है 
ढूँढ़ो तो मिल जाएगा 
झूठ बड़ा गहरा है इनमें 
धोख़ा दे के जाएगा 

भर जाती जब कह जाती सब 
इनमें न बेईमानी है 
चालाकी में लिपट गया जो
उसकी शामत आनी है

आँखें ही पढ़ती है दुनियाँ 
तुमको भी समझाती है 
पढ़ न पाए इनको जो तो 
अनपढ़ तुम्हें बताती है 

उम्र ढली जो सूख गयी यह
धुँधलाती सकुचाती है 
कल की देखीं दुनिया इनको 
आज बहुत रुलाती है 

आँख तनी तो ठाठ बड़ी है 
तुममें फिर कोई बात है 
आँख झुका ली तुमनें जो तो 
इसकी क्या औक़ात है

धुत्त पड़ी है कुछ आँखे तो 
मदिरा की परछायी में 
सच दिखता उनमें भी है पर 
बोतल की गहराई में 

उन आँखों की कोई न पूछे 
जिनके भीतर आग है 
कह-कह कर जो थक गए की 
उनमे भी कुछ बात है 

फ़िर आती है नन्ही आँखें 
इनमें में न कोई पाप है 
दुनिया को जो समझ न पाए 
यह तो केवल पाक है 

शरमाती इतराती आंखें 
इनमें गहरा राज़ है 
आँखों से जो घायल कर दे 
उनकी भी क्या बात है 

यहाँ-वहाँ मंडराती फिरती 
यह भी आँखों की ज़ात है 
भला किसी का कर न सके ये 
इनमें मतलब वाली बात है 

गुस्साती-चिल्लाती आँखें 
इनमे न कुछ ख़ास है 
यहाँ-वहाँ की दुनियादारी 
बेमतलब की बकवास है 

सीधी सहमीं बेचारी सी 
आस की इनमें प्यास है 
इन आँखों में जज़्बात भरी है 
बस मदद की दरखाश्त है 

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