कुछ इस तरह...





दिन की हुई शुरुवात, कुछ इस तरह 
कि पूरी हुई न वो रात, कुछ इस तरह 


जुबां पे रह गयी वो, बात कुछ इस तरह 
कि कह न पाया पिछली रात, कुछ इस तरह 


लेके वो जज़्बात, कुछ इस तरह 
कि देखा मैंने वो ख़्वाब, कुछ इस तरह 


तुम्हें देख ही रहा था भाँप में, कुछ इस तरह 
चाय ठंडी हो गयी और तुम ग़ायब, कुछ इस तरह


लिख रहा था अपनी बात, कुछ इस तरह 
कि कलम भूली मेरी याद, कुछ इस तरह 


डूबा शब्दों के तालाब में, कुछ इस तरह 
लेकिन निकलना था उस पार, कुछ इस तरह



वक़्त का न था  ख़याल, कुछ इस तरह
कि शाम हो गयी मेरे यार, कुछ इस तरह


कर दिया दिन बर्बाद, कुछ इस तरह
कि हो न पाया कोई काज, कुछ इस तरह


सूरज को था इंतज़ार, कुछ इस तरह
लेकिन चाँदनी आयी कुछ देर बाद, कुछ इस तरह


खाने की थी न याद, कुछ इस तरह
 कि भूखा सोया इस रात , कुछ इस तरह


यादों कि थी बरसात, कुछ इस तरह
कि भीगा उसमें सारी रात, कुछ इस तरह


कल का था इंतज़ार, कुछ इस तरह
कि बोलूंगा इस बार, कुछ इस तरह


अगले दिन ....... 

तुम्हें  सोचने का था वो एहसास, कुछ इस तरह
कि भूला मैं हर बात, कुछ इस तरह


लेक़िन......
आँखों में लिखा था सब कुछ साफ़, कुछ इस तरह
कि पढ़ लिया मैंने चुप-चाप, कुछ इस तरह


थामा मैंने वो हाथ, कुछ इस तरह
कि पूरी हुईं वो रात, कुछ इस तरह......



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